चतुर्विंशतिः पाठः
नरस्य (पुरुष का)

1. मित्रम् -धर्मः.
2. शत्रुः -दोषः (अवगणः)
3. आभूषणम् -सदवाणी
4. गुरुः-पितरौ
5. ज्ञानम् -तत्वार्थसंबोधः
6. दया -सर्वसुखैषित्वम्
7. धर्मः -कर्त्तव्यपरायणता
8. कार्यम्-सर्वजीवकल्याणम्
9. अमूल्यं वस्तु -समयः
10. पूजास्थलम् -स्वकमस्थलम्
11. रक्षकः-स्वकर्म
12. हन्ता -स्वकर्म
13. ध्रुवसत्यम् -मृत्युः
14. आलोचनम् -आत्मालोचनम्
15. पुस्तकम् -संसारः
16. उपलब्धः -परहितरक्षा
17. व्याधिः - हृदयपरितापः
शब्दार्थ-मित्रम् = दोस्त। आभूषणम् = गहना । पितरौ = माता-पिता। तत्वार्थसंबोधः = जीवन तत्व का सही ज्ञान । सर्वसुखैषित्वम् = सभी को सुखी देखने की लालसा । ध्रुवसत्यम् = जिसका होना निश्चित है। उपलब्धि = प्राप्ति । परहितरक्षा = दूसरों के हित (कल्याण) की रक्षा। व्याधिः = रोग। हृदयपरितापः = हार्दिक पाश्चात्ताप ।
अर्थ : 1. मनुष्य का सच्चा मित्र उसका धर्म अर्थात् धर्म का पालन करना है।
 2. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसमें निहित दुर्गुण है।
3. मनुष्य का असली आभूषण सुन्दर वचन बोलना है।
4. मनुष्य का सच्चा गुरु माता-पिता हैं।
5. मनुष्य का असली ज्ञान जीवन तत्व की जानकारी है।
6. सबको सुखी देखने की सच्ची भावना ही दया है।
7. मनुष्य का सच्चा धर्म अपने कर्तव्य में लगा रहना है।
8. मनुष्य का सच्चा कार्य सारे जीवों का कल्याण करना है।
9. मनुष्य के जीवन में सबसे मूल्यवान् समय होता है।
10. मनुष्य का अपना कार्यक्षेत्र ही सबसे बढ़कर पूजा का स्थान है।
11. मनुष्य का रक्षक उसका अपना कर्म होता है।
12. मनुष्य अपने कुकर्म से ही नष्ट होता है।
13. मनुष्य का मरना निश्चित है, इसे कोई टाल नहीं सकता।
14. अपने-आपको समझना ही सच्ची आलोचना है।
15. सांसारिक विषयों को जानना ही सच्ची पुस्तक है।
16. दूसरों के हित की रक्षा करना ही जीवन की असली उपलब्धि है।
17. हार्दिक दुःख या चिन्ता ही मनुष्य की व्याधि है।

अभ्यासः
प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1. नरस्य आभूषणं किम् अस्ति?
उत्तर-नरस्य आभूषणं सत्यभाषणं अस्ति।
प्रश्न2. नरस्य को धर्मः।
उत्तर-नरस्य मित्रम् धर्मः।
प्रश्न 3. नरस्य किं कार्यम् ?
उत्तर-नरस्य कार्यम् सर्वजीव कल्याणं अस्ति।
प्रश्न 4. नरस्य को शत्रुः?
उत्तर-नरस्य स्वदोषः एव शत्रुः अस्ति।
प्रश्न- 5. अनेन पाठेन का प्रेरणा प्राप्यते?
उत्तर-अनेन पाठेन प्रेरणा प्राप्यते यत् नरस्य धर्मः एव मित्रम्, दोषः एव शत्रुः तथा सद्वाणी एव आभूषणं भवति ।