एकोनविंशतिः पाठः
जागरण-गीतम्

जागृष्व उत्तिष्ठ तत्परो भव:
ते लक्ष्यमार्ग आवाहयति ।
लोकोऽयं सहसा प्रेरयति।
भेरी नादम् उच्चारयति ।
सत्यं, ध्येयं दुरेस्माकं,
साहसमपि नहि न्यूनम् अस्ति।
सङ्गे मित्राणि बहूनि पथि,
चरणेषु तथाङ्गदबलमस्ति ।।
भस्मीकर्तुम् स्वर्णिम लंकाम्,
स अग्नियुतस्तु समायाति ॥
शब्दार्थ-जागृष्व = जागो। उत्तिष्ठ = उठो। तत्परो = तैयार । भव: = होओ। आवाह्यति = बुला रहा है। लोकोऽयं = यह ससार । प्रेरयति = प्रेरित कर रहा है। ध्येयं = लक्ष्य, मंजिल । भेरी = नगाड़ा। नादम् = आवाज । उच्चारयति = बज रहे हैं। साहसमपि = साहस भी। न्यूनम् = कम। मित्राणि = मित्रों को। बहूनि = अनेक । पथि = रास्ते में। चरणेषु = पैरों में । तथा = वैसा । अंगदबलम् = अति शक्ति । भस्मकर्तुम् = जलाने के लिए। स्वर्णिम = स्वर्णमयी । लंकाम् = लंका को । अग्नियुत = आग के साथ । समायाति = आते हैं।
अर्थ-जागो, उठो, तैयार हो जाओ, तुम्हारा लक्ष्य (उद्देश्य) बुला रहा है। यह संसार उनको अचानक साहस भर रहा है, युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं। यह सच है कि हमारी मंजिल अति दूर है। लेकिन हमारा साहस भी कम नहीं है। इस मार्ग पर चलने वाले अनेक मित्र हैं, साथ ही पैरों में अंगद जैसा बल है। स्वर्णमयी लंका को जलाने के लिए वह अग्नि लेकर आ रहा है। तात्पर्य यह कि देश के नौजवान अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प हैं।
प्रतिपदं कण्टकाकीर्णं वै, ..
व्यवहारकुशलता अस्मासु।
विजयस्य च दृढविश्वासयुता,
निष्ठा कर्मठता अस्मासु।
विजयि पूर्वज जनपरम्परा,
बहुमूल्यधना तु सा जयति ।
अनुगा वै सिंह शिवस्य वयं
राणाप्रतापसम्मानधनाः।
संघटनतन्त्रे शक्तिस्तत्र,
वैभवचित्रं तु विभूषयति ॥

शब्दार्थ-प्रतिपदं = पग-पग । कण्टकाकीर्ण = काँटे बिछे हुए हैं। अस्मासु = हममें । विजयस्य = विजय की। च = और । दृढ़विश्वासयुता = दृढ़विश्वास से लबालब । निष्ठा = श्रद्धा। बहुमूल्य = अतिमूल्यवान् । अनुगा = अनुचर । संघटन = संगठन। वैभव = सम्पन्नता।
अर्थ-पग-पग पर काँटे बिछे हुए हैं। लेकिन हममें व्यवहार कुशलता है और विजय प्राप्ति की पूर्ण ललक है। हमें अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा एवं कर्मठता है । क्योंकि पूर्वजों की विजय परम्परा है, जो हमें विजय प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है। हम शिव के अनुचर सिंह के समान हैं और महाराणा प्रताप के सम्मान-रूपी धन हमें प्राप्त है। संगठन शक्ति से परिपूर्ण है। पूर्वजों के यश रूपी वैभव हमें मिला हुआ है। अर्थात् हमारे पूर्वजों की कीर्ति हमें लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रेरित कर रही है।

अभ्यासः
 प्रश्न एवं उनके उत्तर


प्रश्न 1. कः सहसा केषां प्रेरयति ?
उत्तर-अयं लोकः सहसा अस्माकं प्रेरयति।
प्रश्न2. केषां साहसं न्यूनम् नास्ति ?
उत्तर-अस्माकं (देशवासिनाम्) साहसं न्यूनम् नास्ति।