अष्टमः पाठः
वृक्षैः समं भवतु मे जीवनम्


(मेरा जीवन वृक्ष के समान हो)

1. वसन्तकाले सौरभयुक्तैः
सन्ततिकाले दर्पविमुक्तैः
शीतातपयोः धैर्येण स्थितैः
वृक्षैः समं भवतु मे जीवनम् ।


शब्दार्थ –वसन्तकाले = वसंतकाल में। सौरभ =.सुगंध । युक्तैः = से परिपूर्ण । सन्ततिकाले = फल लगने के समय। दर्प = घमंड। विमुक्त = से मुक्त । शीत = ठंढ़ा । आतप: = गर्मी । धैर्येण स्थितैः = धैर्यपूर्ण । समं = समान । भवतु = हो । मे = मेरा।
अर्थ-कवि की कामना है कि उसका जीवन वृक्ष के समान हो। जिस प्रकार वृक्ष वसंत काल में सुगंध बिखरेता है, फल लगने पर झुक जाता है। ठंढ़ एव गर्मी को धैर्यपूर्वक सहन करता है, उसी प्रकार कवि भी बनना चाहता है।

2. वर्षाकाले आह्लादयुक्तैः
शिशिरकाले निर्भीकचित्तैः
हेमन्तकाले समाधिस्थितैः
वृक्षैः समं भवतु मे जीवनम्।


शब्दार्थ—आह्लादयुक्तैः = सरस हृदय, प्रसन्नता से पूर्ण दिल। निर्भीकचित्तैः = निडर, पराक्रमी । समाधिस्थितैः = ध्यानस्थ, ध्यान में लीन ।
अर्थ-कवि पुनः कहना चाहता है कि जिस प्रकार वर्षा के समय मन प्रेममय हो जाता है तो शिशिर (जाड़ा) के समय पूर्ण निडरता से ठंड का सामना करता है और हेमन्त के समय तपस्वी की भाँति ध्यानस्थ होकर अपने भावी जीवन के चिन्तन में मग्न रहता है, इसलिए कवि भी वृक्ष के समान बनना चाहता है।

3. क्षुधातेभ्यः फलसन्ततेः दानम्
शरणागतेभ्यः आश्रयदानम्
आतपातेभ्यः छायादानम्
वृक्षाणां व्रतं, तद्वत् स्यान्मे जीवनम् ।


शब्दार्थ-क्षुधार्तेभ्यः = भूख से व्याकुल व्यक्ति के लिए। फल सन्तते दानम् = फलरूपी सन्तान का दान करता है। शरणागतेभ्यः = आश्रय में आए हुओं को । आश्रयदानम् = आश्रय प्रदान करता है। आतपार्तेभ्य = गर्मी (धूप) से व्याकुल को। छायादानम् = छाया प्रदान करता है। वृक्षाणां = वृक्षों का । तद्वत् = वैसा ही। स्यात् = हो। मे = मेरा।
अर्थ-कवि का कहना है कि जिस प्रकार वृक्ष भूख से व्याकुल व्यक्ति को अपना फल देकर तृप्ति प्रदान करता है, शरण में आए हुए को आश्रय प्रदान करता है, धूप से व्याकल व्यक्ति को अपनी शीतलता से शांति प्रदान करता है। इसलिए कवि चाहता है कि उसका जीवन भी वृक्ष के समान परोपकारी हो।

4. कृतं यैः सीतायाः सतीत्वरक्षणं
बुद्धस्य आत्मज्ञानस्य साक्ष्यम्
पाण्डवशस्त्राणां गोपनम्
वृक्षैः समं भवतु मे जीवनम्।


शब्दार्थ-कृतं = किया गया। यैः = जिसके द्वारा । सीतायाः = सीता की । बुद्धस्य = गौतम बुद्ध के। आत्मज्ञानस्य = आत्म-ज्ञान का। साक्ष्यम् = गवाह । पाण्डवशस्त्राणां = पाण्डवों के अस्त्र-शस्त्र को। अर्थ-कवि का कहना है कि जिस पेड़ ने सीता के सतीत्व की रक्षा की। जिस पेड़ के तले बुद्ध को आत्मज्ञान का बोध हुआ। जिस पेड़ ने वनवास काल में पाण्डवों के अस्त्र-शस्त्र के लिए गुप्त स्थान का काम किया, मेरा जीवन उसी पेड़ के समान बने।

5. शुष्कतायां सम्प्राप्तायाम् अपि
यैः अर्प्यते जीवनं परेषां कृते.
आत्मा दह्यते चुल्लिकायां यैः मुदा
वृक्षैः समं भवतु मे जीवनम् ।


शब्दार्थ-शुष्कतायां = सूखने पर । यैः = जिसके द्वारा । अर्यते = अर्पण किया जाता है। परेषां = दूसरों के लिए । दह्यते = जलाया जाता है।
अर्थ—कवि वृक्ष की विशेषता के विषय में कहता है कि वृक्ष सूखने के बाद भी अपना महत्त्व साबित करता है। वृक्ष सूखने पर जलावन के रूप में दूसरों का उपकार करता है। लोग सूखी लकड़ी चूल्हा में जलाकर खाना पकाते हैं, मृत्त शरीर को जलाते हैं तथा लकड़ी का अनेक कार्यों में उपयोग करते हैं। तात्पर्य यह कि वृक्ष का सम्पूर्ण जीवन लोकोपकार के लिए समर्पित होता है। इसलिए कवि भी वृक्ष के समान अपना साराजीवन लोक कल्याण में अर्पित करने का आग्रही है।

6. आ जन्मनः समर्पणम् आमरणं
लोकस्य हितायैव येषां जीवनम्
जीवनं मृतिश्चापि येषां सार्थकं
वृक्षैः समं भवतु में जीवनम् ।


शब्दार्थ-आजन्मनः = जीवनपर्यन्त, जन्मकाल से। आमरणं = मृत्युपर्यन्त । लोकस्य = संसार के। हितायैव = कल्याण के लिए ही । येषां = जिसके। मृतिश्चापि = मरने (सूखने) के बाद भी। सार्थक = अर्थपूर्ण, उपयोगी।
अर्थ-कवि कहता है कि वृक्ष जन्मकाल से मरणोपरान्त दूसरों के उपकार के लिए समर्पित होता है। मरने के बाद भी लोग लकड़ी का विभिन्न प्रकार से उपयोग करते हैं। अतः जिसका जीवन मरणोपरान्त भी कल्याणकारी होता है, उसी वृक्ष के समान कवि लोकहितकारी बनना चाहता है।

अभ्यासः
प्रश्न एवं उनके उत्तर


प्रश्न 1. अस्य पाठस्य भावार्थं लिखत ।
उत्तर-पाठ के श्लोकों का अर्थ देखें।
प्रश्न 2. लोकस्य हिताय वृक्षाः किं-किं कुर्वन्ति ?
उत्तर-लोकस्य हिताय वृक्षाः सौरभं ददति, फलन्ति, शीततापयोः रक्षन्ति, छायाम् प्रयच्छन्ति तथा शुष्कता सम्प्राप्ते चूल्हिकायां दह्यते।