सप्तदशः पाठः राष्ट्रस्तुति

अखण्डं राष्ट्रदेवं स्वं,
नमामो भारतं दिव्यम् ।
नगेन्द्रः सैनिको भूत्वा,
बलिष्ठो विस्तृताकारः।
अरिभ्यो दुष्टवायुभ्यः
स्वदेशं त्रायते नित्यम् ॥
अखण्डं ...
शब्दार्थ-राष्ट्रदेवं = राष्ट्ररूपी देवता। स्वं = अपने । नमामो = नमस्कार करते हैं। नगेन्द्र = पर्वतों का राजा (हिमालय)। भूत्वा = होकर । बलिष्ठो = बलवान् । विस्तृताकारः = विशाल आकार वाला । अरिभ्यो = शत्रुओं से। दुष्टवायुभ्यः = शैतान हवाओं से । त्रायते = रक्षा करता है।
अर्थ-हम अपने राष्ट्ररूपी देवता अखंड भारत को नमस्कार करते हैं, जिसकी उत्तर दिशा में विशाल आकार वाला पर्वतों का राजा हिमालय बलवान् सैनिकों की भाँति शत्रुओं एवं दूषित हवाओं से देश की रक्षा करता है। उस महान् भारत को बार-बार नमस्कार है।
त्रिवृतः सागरः शिष्टो,
विनीतः सेवको भूत्वा।।
पदप्रक्षालनं कुर्वन्,
विधत्ते वन्दनं पुष्पम् ।।
अखण्डं ....
शब्दार्थ-त्रिवृतः = तीन तरफ से । शिष्टो = शिष्ट, सभ्य । विनीतः = विनम्र । भूत्वा = होकर । पदप्रक्षालनं = पैर धोता है। विधत्ते = धारण करता है। वन्दनं = प्रार्थना। पुष्पम् = फूल।
अर्थ-शिष्ट (सभ्य) तथा विनम्र सेवक की भाँति तीन ओर से सागर. इस महान् भारत देश का पैर धो रहा है तथा फूल एवं वन्दना से पूजित इस विशाल एवं अखंड. भारत को बार-बार नमस्कार है।
वहन्त्यः स्नेहजलधाराः
सुनद्यः मातृका भूत्वा।
स्वपुत्रान् पालयन्त्यस्ताः
ददत्यः श्यामलं शश्यम् ।
अखण्डं ...
शब्दार्थ-वहन्त्यः = बहती हुई । स्नेहजलधारा = प्रेम रूपी जल की धारा । सुनद्यः = पवित्र नदियाँ । मातृका = माता। भूत्वा = बनकर, होकर । स्वपुत्रान् = अपने पुत्रों को, देशवासियों को। पालयन्ति = पालन करती हैं। ताः = वे (नदियाँ)। ददत् = देती हैं। यः = जो। श्यामल = हरी-भरी। शस्यम् = फसल ।
अर्थ-ये सुन्दर (पवित्र) नदियाँ माता के समान अपने स्नेह जल से सींचकर खेतों को हरा-भरा रखती हैं। देशवासी इन फसलों से अपना भरण-पोषण करते हैं। अर्थात् बहती हुई नदियों के जल से किसान अपनी फसल को सींचते हैं। उस महान् देश को नमस्कार है।
समधिकः स्वर्गतो रम्यः,
स्वभारतवर्ष-भूभागः।
निवासं कर्तुमिच्छन्तः,
सुदेवाः सन्ति यत्रत्यम् ।।
अखण्डं ...
शब्दार्थ-स्वर्गतो = स्वर्ग से। रम्यः = रमणीय, सुन्दर। भूभागः = क्षेत्र । कर्तुम = करने के लिए। इच्छन्तः = इच्छुक । सुदेवाः = देवतागण ।
अर्थ- हमारे देश भारत का भूभाग (धरती) स्वर्ग से भी अधिक रमणीय है जहाँ . देवता भी निवास करने के इच्छुक हैं। अर्थात् जिस देश की धरती पर देवता भी मानव रूप में अवतरित होते हैं, उस महान् देश को हमारा नमस्कार है।
प्रथमतो ज्ञानदीपो यैः,
प्रज्वलितो भारतीयास्ते।
जगद्गुरवो हि संपूज्या,
तदनु शिक्षितमहो विश्वम् ।
। अखण्डं ..........
शब्दार्थ-प्रथमतो = सर्वप्रथम । ज्ञानदीपो = ज्ञान का प्रकाश। यै = जिसके द्वारा। •प्रज्वलितो = जलाया गया, फैलाया गया। ते = वे। संपूज्या = पूजित हुआ, पूजा गया। तदनु = अनुकरण करके। शिक्षितमहो = शिक्षा प्राप्त की।
अर्थ-जिस देश ने सर्वप्रथम सारे संसार को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित किया. वह भारत ही है। सम्पूर्ण संसार ने इसी देश से ज्ञान की शिक्षा प्राप्त की, इसलिए यह विश्वगुरु के नाम से विख्यात हुआ। उस अखंड विशाल भारत को हमारा नमस्कार है।
किमधिकं भाषणं कुर्मः,
स्वदेश! त्वत्कृते नूनम् ।।
र महत्पुण्येन हि लब्धं,
स्वजन्म भारते धन्यम् ।।
अखण्डं ......
शब्दार्थ-किमधिकं = क्या अधिक । कुर्मः = करें । त्वत्कृते = तुम्हारे लिए। नूनम् = निश्चय ही। महत् = महान् । पुण्येन = पुण्य से। लब्धम् = प्राप्त किया। स्वजन्म = अपना जन्म । भारते = भारत में। धन्यम् = धन्य हूँ।
अर्थ-हे भारत देश! तुम्हारी प्रशंसा मैं कहा तक करूँ। मैं अवश्य ही धन्यवाद का पात्र हूँ, क्योंकि यहाँ उसी का जन्म होता है जो पुण्यवान् होता है। मैं इस पुण्यभूमि अखंड भारत को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
अतः प्राणार्पणं कृत्वा,
तथा सर्वस्वमपि हित्वा ।
सुरक्ष्यं भारतं श्रेष्ठं,
स्वराष्ट्र दैवतं नित्यम् ।।
अखण्डं......
शब्दार्थ-अतः = इसलिए। प्राण = जीवन। अर्पण = न्योछावर। प्राणार्पणं =जीवन न्योछावर। कृत्वा = करके। सर्वस्वम् = सब कुछ। अपि = भी। हित्वा = त्यागकर । सुरक्ष्यं = सुरक्षित । स्वराष्ट्र = अपने राष्ट्र को । देवतं = देवता रूप को। नित्यम् = नित्य, प्रतिदिन।
अर्थ-इसलिए अपना जीवन न्योछावर करके और अपना सारा सुख त्यागकर देवता स्वरूप अपने राष्ट्र श्रेष्ठ भारत को सदैमाणापन से सुरक्षित रखेंगे। हम अपने महान् देश भारत को प्रणाम करते हैं।

अभ्यासः
प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1. हिमालयः कस्मात् कस्मात् स्वदेशं त्रायते ?
उत्तर-हिमालयः अरिभ्यः दुष्टवायुभ्यः च स्वदेशं त्रायते।
प्रश्न 2. भारतमातुः पादप्रक्षालनं कः करोति?
उत्तर-भारतमातुः पादप्रक्षालनं समुद्रः करोति।