षष्ठः पाठः
 मधुराष्टकम्

अधरं मधुरं वदनं मधुरं
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 1।।

शब्दार्थ-अधरं = ओठ। मधुरं = मीठा, सुन्दर । वदनं = शरीर । नयनं = आँखें। हसितं = हँसी। हृदयं = हृदय । गमनं = चलना। मधुराधिपतेः = मिठास (प्रेम) के स्वामी के। अखिलं = सम्पूर्ण, सब कुछ।
अर्थ-श्रीकृष्ण के मधुर प्रेम का वर्णन है। उनके ओठ, शरीर, आँखें, हँसी, हृदय (विचार), चलना-फिरना सब कुछ मधुर है। ये मधुर (मिठास, प्रेम) के स्वामी हैं, इसलिए श्रीकृष्ण की सारी चीजें मधुर हैं।

वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मथुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।2।

शब्दार्थ-वचनं = वचन, वाणी। चरितं = चरित्र, जीवन । वसनं = वस्त्र । वलितं = केश। चलितं = चाल। भ्रमितं = घूमना-फिरना।
अर्थ-श्रीकृष्ण की वाणी मधुर है, उनका जीवन मधुर है, उनके वस्त्र तथा केश मधुर हैं। उनका चलना-फिरना आकर्षक है। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्ण सारे सौन्दर्य के स्वामी हैं, इसलिए उनका सब कुछ उनके भक्त को मधुर या सुन्दर प्रतीत होता है।

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥3॥

शब्दार्थ-वेणुः = बाँसुरी। रेणु = चरण की धूलि । पाणि = हाथ । पादौ = दोनों पैर। नृत्यं = नाचना । सख्यं = मित्र।।
अर्थ- श्रीकृष्ण की बाँसुरी की आवाज मधुर है, उनके चरण की धूल मधुर (पवित्र) है। उनके हाथ-पैर मधुर (सुन्दर) हैं। उनका नाचना अति रमणीय है तथा उनके बाल-सखा के साथ क्रीड़ा करना मधुर है। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्ण सौन्दर्य (मधुरता) के स्वामी हैं, इसलिए उनका सान्निध्य प्राप्त कर प्रत्येक चीज मधुर प्रतीत होती है।

गीतं मधुरं पीतं मधुरं
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥4॥

शब्दार्थ—गीतं = गीत, गाना। पीतं = पीना। भुक्तं = भोजन करना। सुप्तं = सोना। रूपं = रूप । तिलकं = तिलक, चन्दन ।
अर्थ-श्रीकृष्ण का गाना, खाना-पीना, सोना तथा उनका सुन्दर रूप एवं माथे पर लगा तिलक मन को मोह लेते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण का हर कुछ मधुर लगता है और श्रीकृष्ण मनोहरता के स्वामी प्रतीत होते हैं।

करणं मधुरं तरणं मधुरं
हरणं मधुरं रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।5।।

शब्दार्थ-करणं = कार्य । तरणं = उद्धार करना । हरणं = अपहरणं करना । रमणं = रमण करना। वमितं = उल्टी, वमन । शमितं = शमन करना।
अर्थ-भक्त को श्रीकृष्ण का कार्य करना, उद्धार करना, किसी का अपहरण करना, रमण करना, वमन करना तथा शमन करना अति मधुर लगता है, क्योंकि श्रीकृष्ण मधुरता या सौंदर्य के स्वामी हैं। उनका हर कुछ मधुर है।

गुजा मधुरा माला मधुरा
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।।6।।

शब्दार्थ-गुञ्जा = वैजन्ती का फूल । वीची = लहर, तरंग। सलिलं = जल । कमलं = कमल।
अर्थ-वैजन्ती फूल की माला सुन्दर लगती है। यमुना में उठती लहर (तरंग) मधुर लगती है तो यमुना का श्याम जल एवं उसमें खिले कमल के फूल मनोहर प्रतीत होते हैं। यानी श्रीकृष्ण सम्पूर्ण सौंदर्य के स्वयं उद्गम है, स्वामी हैं, इसलिए उनका हर कुछ भक्त को मधुर लगता है।

गोपी मधुरा लीला मधुरा
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥7॥

शब्दार्थ-गोपी = ग्वाल-बालाएँ (गोपियाँ) । लीला = रास लीला। युक्तं = मिलन। मुक्तं = बिछुड़ना । दृष्टं = देखना । शिष्टं = आचरण, व्यवहार।
अर्थ—भक्त को गोपियों की अनन्य भक्ति अच्छी लगती है। उनकी रास-लीला प्रिय . लगती है। गोपियों के साथ श्रीकृष्ण का मिलन तथा वियोग अच्छा लगता है तो उनकी दृष्टि एवं व्यवहार चित्त को मोह लेता है, क्योंकि श्रीकृष्ण मधुरता के स्वामी हैं।

गोपा मधुरा गावो मधुरा
यष्टिर्मधुरा मुष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥8॥

शब्दार्थ-गोपा = राधा । गावो = गाय । यष्टि = छड़ी, लाठी । मुष्टि = मुक्का। दलितं = दमन करना । फलितं = फल देना।
अर्थ-भक्त को श्रीकृष्ण की राधा प्रिय लगती है, उनकी गाएँ अच्छी लगती हैं, उनके हाथ की छड़ी अच्छी लगती है। उनका मुक्का अच्छा लगता है तो दुष्टों का दमन करना तथा कर्मानुसार किसी को फल देना अच्छा लगता है। तात्पर्य कि कवि कृष्ण का गुणगान करने, उभका सान्निध्य प्राप्त करने का अभिलाषी है, ताकि उसका उद्धार हो जाए । श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं। सृष्टि की सारी चीजें उन्हीं की देन हैं। वही सारे सौन्दर्यों के मूल हैं। इसलिए उनका सब कुछ मधुर है।

 अभ्यासः
 : प्रश्न एवं उनके उत्तर

 प्रश्न 1. भगवतः कृष्णस्य किं किं मधुरम् ?
उत्तर--भगवतः कृष्णस्य अधरं, वदनं, नयनं, गोपी, यमुना, वेणुः सर्वम् मधुरं अस्ति ।
प्रश्न 2. अस्य पाठस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर--अस्य पाठस्य भावार्थ अस्ति यत् श्रीकृष्णः मधुराधिपतेः अस्ति । अतएव तस्य अखिलं (सर्वम्) मधुरं अस्ति । ईश्वरमेव सत्यं, जगतः असत्यं भवति । श्रीकृष्णस्य सान्निध्यं प्राप्य भवसागरात् मुक्ति भवति । अस्मात् तस्य सर्वम् मधुरं (उद्धारक) भवति ।