पञ्चदशः पाठः
जयतु संस्कृतम्

जयतु संस्कृतं जयतु संस्कृतम् संस्कृता सुरभारती या,देशगौरवकारिणी वन्दनीया सेवनीया सर्वदा हितकारिणी। जगति विश्रुतं तदिह संस्कृतम्,
 जयतु ....... 
शब्दार्थ-रागे = राग में। जयत = जय हो। संस्कृता = सभ्य, शुद्ध । सुरभारती =देवभाषा। या = जो। देशगौरवकारिणी = देश का गौरव बढ़ानेवाली। वन्दनीया =वन्दनीय । सेवनीया = सेवने योग्य । सर्वदा = हमेशा। हितकारिणी = कल्याण करने वाली । जगति = संसार में। विश्रुत = विख्यात ।
अर्थ-संस्कृत भाषा की जय हो, संस्कृत की जय हो। संस्कृत शुद्ध, सभ्य तथा देवभाषा कहलाती है, जो देश के गौरव को बढ़ाने वाली, पूज्य तथा सबके पढ़ने योग्य हमेशा कल्याण करनेवाली सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। उस संस्कृत भाषा की जय हो। लोकवेदमयी सुभाषा, रागताललयान्विता, या चतुः पुरुषार्थदा सा, साधयत्युपयोगिताः चरतु संस्कृतं पठतु संस्कृतम्। जयतु ......
शब्दार्थ-लोक = संसार । सुभाषा = सुन्दर भाषा। रागताललयान्विता = राग, ताल. लय से युक्त । या = जो। चतुः = चार । पुरुषार्थदा = पुरुषार्थ देनेवाली। चरत = आचरण करे। पठतु = पढ़ें। 
अर्थ-संस्कृत भाषा संसार में वेदमयी है, यह अति सुन्दर राग, ताल और लय से युक्त है। जो भाषा चारों प्रकार के पुरुषार्थ को देने वाली है तथा जिस भाषा के अध्ययन से जीवन सफल होता है। अतः उत्तम आचरण के ज्ञान के लिए संस्कृत पढें। संस्कत भाषा की जय हो। विश्वमानवधर्मभावम्, एकतां खलु भारते, वस्तुतः परिरक्षितुं सा, योग्यता भुवि संस्कृते। अवतु संस्कृतं लसतु, संस्कृतम् । जयतु .....
शब्दार्थ-विश्वमानवधर्मभावम् = संसार को मानवता का पाठ पढ़ाने वाली। परिरक्षितं = रक्षा करने के लिए। भुवि = धरती पर । अवतु = प्रसार । लसत् = शोभित ।।
 अर्थ-संसार में मानवता की स्थापना करनवाला, भारत में एकता स्थापित करनेवाली भाषा संस्कत वास्तव में रक्षणीय है। सम्पूर्ण ससार म संस्कृत भाषा का प्रसार हो, सभी संस्कृत में बात करें तथा संस्कृतमय हो जाएँ। उस संस्कृत भाषा की जय हो। संस्कृतं सरलं सुबोधं, नैव कठिनं वर्तते, भाषणं द्रुतलेखनं वा, शीघ्रमेवागम्यते । सुगमसंस्कृतं सरलसंस्कृतम्। जयतु संस्कृतं जयतु संस्कृतम् ॥
 शब्दार्थ—सरलं = आसान । सुबोधं = समझ में जानेवाली। नैव = न ही। वर्तते = है। अवगम्यते = आती है।
 अर्थ-संस्कृत भाषा सरल एवं सुबोध है। यह बिल्कुल आसान है। संस्कृत में बोलना तथा लिखना अति शीघ्र आ जाता है। यह एकदम सुगम एवं सरल है। तात्पर्य कि संस्कृत भाषा का व्याकरण इतना समद्ध एवं सुव्यवस्थित है कि इसे सीखने या पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती। अतएव संस्कृत भाषा की जय हो।

अभ्यासः
प्रश्न एवं उनके उत्तर

 प्रश्न 1. देशगौरवकारिणी भाषा का अस्ति ? 
उत्तर-देशगौरवकारिणीभाषा संस्कृतभाषा अस्ति।
प्रश्न 2. अस्य पाठस्य भावार्थं लिखत । 
उत्तर—संस्कृत भाषा की जय हो, संस्कृत की जय हो। संस्कृत शुद्ध, सभ्य तथा देवभाषा कहलाती है, जो देश के गौरव को बढ़ाने वाली, पूज्य तथा सबके पढ़ने योग्य हमेशा कल्याण करनेवाली सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है। संस्कृत भाषा संसार में वेदमयी है, यह अति सुन्दर राग, ताल और लय से युक्त है। जो भाषा चारों प्रकार के पुरुषार्थ को देने वाली है तथा जिस भाषा के अध्ययन से जीवन सफल होता है। अतः उत्तम आचरण के ज्ञान के लिए संस्कृत पढें। संसार में मानवता की स्थापना करनवाला, भारत में एकता स्थापित करनेवाली भाषा संस्कत वास्तव में रक्षणीय है। सम्पूर्ण ससार म संस्कृत भाषा का प्रसार हो, सभी संस्कृत में बात करें तथा संस्कृतमय हो जाएँ। संस्कृत भाषा सरल एवं सुबोध है। यह बिल्कुल आसान है। संस्कृत में बोलना तथा लिखना अति शीघ्र आ जाता है। यह एकदम सुगम एवं सरल है। तात्पर्य कि संस्कृत भाषा का व्याकरण इतना समद्ध एवं सुव्यवस्थित है कि इसे सीखने या पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती। अतएव संस्कृत भाषा की जय हो।