भवान्यष्टकम्

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।


शब्दार्थ - न=नहीं; तात=पिता; माता=मां; बन्धु:=भाई; दाता=देनेवाला; पुत्र:=पुत्र; पुत्री=पुत्री; भृत्यो=नौकर; भर्ता=स्वामी(भरण-पोषण करनेवाला); जाया=स्त्री; विद्या=ज्ञान; वृत्ति=रोजी-रोटी ; मम=मेरा; एव= ही; गति:=उद्धारक; त्वं=तुम ;एका=एक ; भवानी=भवानी(काली, दुर्गा, पार्वती)

अर्थ:- हे जगतमाता भवानी । इस संसार में मेरा न तो पिता है , न माता है , न कोई भाई है और न ही दाता है . न बेटा है , न बेटी है , न नौकर है , न पालन - पोषण करनेवाला , न पत्नी है , न विद्या ( ज्ञान ) है और न कोई पेशा व्यवसाय ) ही है । अर्थात् संसार में एकमात्र तुम्ही मेरा सहारा हो . तुम्ही उद्धारकर्ता हो ।

भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।



शब्दार्थ - भवाब्धावपारे=भव सागर में पड़ा; महादु:खभीरु=अपार कष्ट से भयभीत;पपात=गिरा हुआ;प्रकामी=अति कामुक;प्रलोभी=अति लोभी; प्रमत्त:=अहंकारी; कुसंसारपाश=सांसारिक मोह-माया;प्रबद्ध=बंधा हुआ;सदा=हमेशा;अहम्=मैं


अर्थ: - सांसारिक विषय - वासनाओं में डूबा अपार दुख से पीड़ित हूँ । मैं अति नीच , अति कामी , महान् लोभी , अति घमंडी हूँ । इस कारण में हमेशा सांसारिक बंधनों से जकड़ा हुआ रहता हूँ । हे जगदम्बा ! तुम ही मेरा सहारा हो । तुम्ही हमें संसार रूपी सागर से पार कर सकती हो ।

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।



शब्दार्थ- न जानामि = नहीं जानता हूँ । दानं = देना , त्याग करना । च = और । ध्यानयोगं = ध्यान एवं योग । तन्त्रं = तन्त्र संबंधी । स्तोत्रं = पूजा - पाठ । मन्त्रं = जप । न्यासयोगम् = प्राणायाम ।


अर्थ:- हे माते ! मैं किसी को दान देना नहीं जानता हूं और न ही ध्यान - योग का जान है । तन्त्र - मंत्र पूजा - पाठ भी नहीं जानता हूँ । इतना ही नहीं , तुम्हारी पूजा - अर्चना की विधि नहीं जानता हूँ तथा आसन - प्राणायाम भी नहीं जानता हूँ कि इसके माध्यम से तुम्हें पा सकें । इसलिए एकमात्र तुम्ही मेरा सहारा हो ।

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मात
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।



शब्दार्थ - पुण्यं = पुण्य करना , उपकार करना । तीर्थं = तीर्थाटन करना । मुक्तिं = मोक्ष प्राप्ति का उपाय । लयं = मधुर स्वर ( आवाज ) । कदाचित् =कभी । भक्तिं = आराधना , समर्पित होना । व्रतं = उपवास करना । अपि = भी ।


अर्थ: - हे भवानी ! मैं पुण्य तथा तीर्थ - व्रत करना नहीं जानता हूँ । मुझे मोक्ष प्राप्ति की विधि का ज्ञान ( भी ) नहीं है । स्वर ( आवाज ) में इतनी मधुरता नहीं है कि मै अपने आर्तस्वर से तुम्हें खुश कर सकूँ । साथ ही , भक्ति - भाव का भी ज्ञान नहीं है । इसलिए हे माँ ! तुम्ही मेरा सहारा हो ।

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धि: कुदासः
कुलाचारहीन: कदाचारलीन: ।
कुदृष्टि: कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।



शब्दार्थ - कुकर्मी = बुरा कर्म करने वाला ; कुसंगी = दुराचारियों के साथ रहने वाला ; कुबुद्धिः = बुरे विचार वाला ; कुदासः = दुराचारी सेवक ; कुलाचारहीनः = वंश संबंधी मर्यादा को न माननेवाला ; कदाचारलीनः बुरे कर्म में लीन ; कुदृष्टिः = ईर्ष्यालु ; कुवाक्य प्रबन्धः = बुरा वचन बोलने वाला; सदा = हमेशा ; अहम् = मैं ;


अर्थ: - हे माते ! मैं कुकर्मी , बुरे लोगों के साथ रहनेवाला , कुविचारी , कृतघ्न , अनुशासन हीन , बुरा कर्म करने वाला , ईर्ष्यालु तथा हमेशा कुवचन बोलने वाला हूँ । इसलिए हे माँ ! तुम्ही इन दुष्कर्मो से मुझे छुटकारा दिला सकती हो । तुम्हारे सिवाय मेरा कोई सहारा नहीं है ।

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्र्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ।।



शब्दार्थ - प्रजेशं ( प्रज्ञा + ईशं ) = राजा , ब्रह्मा ; रमेशं ( रमा + ईशं ) = विष्णु ; महेशः ( महा + ईशः )= महादेव ; सुरेशः ( सुर + ईशः ) = इन्द्र ; दिनेशः ( दिन + ईशः ) = सूर्य ; निशीथेश्वर ( निशीथ + ईश्वर ) = चन्द्रमा ; चान्यत् ( च + अन्यत् ) = और दूसरे को ;


अर्थ:- हे जगदम्बे ! मैं प्रजा के स्वामी ब्रह्मा , विष्णु , महेश , इन्द्र , सूर्य तथा चन्द्रमा आदि किसी दूसरे को नहीं जानता । मैं तो सिर्फ तुम पर आश्रित हूँ कि तुम्हीं मुझे इस भवसागर से उद्धार कर सकती हो । इसलिए मैं सिर्फ तुम्हीं पर आश्रित हूँ ।

अभ्यासः

प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.

अस्मिन् पाठे कस्याः वर्णनम् अस्ति ? (इस पाठ में किसका वर्णन है?)

1. उत्तर

- अस्मिन् पाठे भवान्याः वर्णनम् अस्ति ।(इस पाठ में भवानी वर्णन है।)

प्रश्न 2 .

सर्वेषां शरण्या का अस्ति ? (सभी किसके शरण में है?)

2. उत्तर

- सर्वेषां शरण्या भवानी अस्ति ?(सभी भवानी के शरण में है।)

प्रश्न 3 .

सर्वेषां गतिः का अस्ति ? (सभी किसके आश्रय में है?)

3. उत्तर

- सर्वेषां गतिः भवानी अस्ति ।(सभी भवानी के आश्रय में है।)