तृतीयः पाठः
अच्युताष्टकम्

अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं बासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥1॥

शब्दार्थ—अच्युतं = विष्णु को। केशवं = कृष्ण को। वासुदेवं = वसुदेव पुत्र को। हरिम् = ईश्वर को। श्रीधरं = लक्ष्मी को धारणवाले को। वल्लभं = स्वामी को। जानकीनायकं = जानकी के पति को। रामचन्द्रं = रामचन्द्र को। भजे = भजता हूँ।
अर्थ-अच्युत (विष्णु), केशव, रामनारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि (ईश्वर), श्रीधर, माधव, गोपिका-वल्लभ, जानकीपति रामचन्द्र आदि को भजता हूँ। अर्थात् ये सारे विष्णु रूप में अवतरित हुए, जिनके नाम का स्मरण करके लोग भवसागर से पार उतरे।

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥2॥

शब्दार्थ-सत्यभा = सत्यभामा । राधिका = राधा। आराधितम् = राधा ने जिनकी आराधना की। इन्दिरामंदिरम् = इन्दिरा के मन मंदिर में निवास करने वाले। चेतसा = हृदय । देवकीनन्दनं = देवकी पुत्र कृष्ण । नन्दजं = नन्द के पुत्र कहलाने वाले। सन्दधे = की शरण में।
अर्थ-अच्युत, केशव, सत्यभामा के प्राणप्रिय, माधव, श्रीधर, राधिका द्वारा आराधित या पूजे जाने वाले, इन्दिरा (लक्ष्मी) के मन-मंदिर में निवास करनेवाले देवकी-नंद के पुत्र श्रीकृष्ण की शरण में समर्पित हूँ । अर्थात् हे प्रभु! आपने विभिन्न रूपों में प्रकट होकर भक्तों का उद्धार किया है। यानी जग के कल्याण के लिए निर्गुण होते हुए भी अवतार ग्रहण किया। इसलिए मैं अपने उद्धार के लिए अपने आपको तुम पर अर्पित कर दिया हूँ।

विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे
रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये ।
बल्लवी-वल्लभाया र्चितायात्मने
कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ।।3।।

शब्दार्थ-विष्णवे = विष्णु को, के लिए। जिष्णवे = ईर्ष्या नष्ट करने वाले को। शङ्खिने चक्रिणे = शंख तथा चक्र धारण करने वाले को, के लिए। रुक्मिणीरागिणे = रुक्मिणी से प्रेम करने वाले को, के लिए । जानकीजानये = जानकी के पति । र्चितायात्मने = हृदय में वास करने वाले । कंसविध्वंसिने = कंस को मारने वाले। वंशिन् = वंशी धारण करने वाले को । नमः = नमस्कार है।
अर्थ-विष्णु, ईर्ष्या नष्ट करने वाले, पाञ्चजन्य शंख तथा चक्र धारण करने वाले, रुक्मिणी से प्रेम करने वाले, जानकी पति, वल्लवी-वल्लभाया (गोपियों के हृदय में वास करनेवाले), कंस को मारनेवाले तथा वंशी धारण करने वाले उसी श्रीकृष्ण को मेरा, - नमस्कार है। अर्थात् विष्णु रूप कृष्ण को नमस्कार है।

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ।।4।।

शब्दार्थ-श्रीपते = विष्णु । श्रीनिधे = धन के खजाने। अच्युतानन्त = निर्गुण एवं असीम। माधवाधोक्षज = असहायों के उद्धारक। द्वारकानायक = द्वारका के स्वामी। द्रौपदीरक्षक = द्रौपदी की लाज बचाने वाले।
अर्थ-हे कृष्ण! हे गोविन्द! हे राम ! हे नारायण ! हे श्रीपते ! हे अजेय वासुदेव ! - श्रीनिधे, अच्युत, अनन्त, पापियों के उद्धारक माधव, द्वारकाधीश द्रौपदी की लाज बचाने वाले श्रीकृष्ण आपको मेरा शत-शत प्रणाम है। अर्थात् हे कृष्ण जिस प्रकार आपने अपने भक्तों की रक्षा की है तथा आततायियों का अंत करके लोगों को भयहीन किया है, उसी प्रकार मेरी सारी विषय-वासनाओं को नष्ट करके अपनी शरण लगा लो।

राक्षसक्षोभित: सीतया शोभितो
दण्डकारण्य-भूपुण्यता-कारण:।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो-
ऽगस्त्यसम्पूजितो राधवः पातु माम् ।।5।।

शब्दार्थ-राक्षसक्षोभित = राक्षसों को नष्ट करनवाले। सीतया शोभित = सीता से शोभायमान । दण्डकारण्य-भूपुण्यता = दण्डक वन की भूमि को पवित्र बनाने वाले। वानरैः सेवितो = वानरों द्वारा पूजित । अगस्त्य सम्पूजितो = अगस्त्य-मुनि द्वारा पूजित । राघवः = रघु वंश के उद्धारक । पातु माम् = मेरी रक्षा करें।
अर्थ- राक्षसों को नष्ट करने वाले, सीता से शोभित होने वाले दण्डक वन की भमि को पवित्र करने वाले, लक्ष्मण एवं वानरों द्वारा पूजित तथा अगस्त्यमुनि के आराध्य राघव मेरी रक्षा करें । अर्थात् हे राधव! मैं आपकी शरण में हूँ। सांसारिक मोह-माया के जाल से मुक्ति प्रदान करें।

धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् द्वेषिणां
केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः।
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो
बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ।।6।

शब्दार्थ-धेनुकारिष्टकः अनिष्कृद् = धेनुका के उत्पातों से त्राण दिलाने वाले । द्वेषिणां = दृष्टों का नाश करने वाले । केशिहा=केशि नामक राक्षस को मारने वाले । कंसहृत् = कंस का संहार करने वाले। वंशिकावादकः = बांसुरी बजाने वाले। पूतनाकोपक = पूतना नामक राक्षसी के संहारक । बालगोपालकः= ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने वाले । सर्वदा= हमेशा। सूरजाखेलिनो = देवपुत्रियों के साथ खेलने वाले।
अर्थ-धेनुका नामक राक्षस के उत्पातों से त्राण दिलानेवाले, द्रुष्टों के संहारक, केशि नामक राक्षस को मारनेवाले, कंस का दर्प दलन करने वाले, वृन्दावन में बाँसुरी बजाने वाले, पृतना नामक राक्षसी को मारनेवाले, देवपुत्रियों के साथ खेलनेवाले, ग्वाल-बालों के साथ गाय चराने वाले हे श्रीकृण! आप मेरी सदा रक्षा करें।

विधुदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं
प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोरः स्थलं
लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥7॥

शब्दार्थ-विद्युदुद्योतवत् = बिजली जैसे चमकते प्रकाश के समान । प्रस्फुरद्वाससं = चमकते वस्त्र वाले। प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् = जल में खिले हुए कमल जैसे सुन्दर शरीरवाले । वन्यया मालया = वनमाल फूल की माला से । शोभितोरः स्थलं = शोभायमान वक्षस्थल । लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं = दोनों आँखें लाल कमल के समान लाल वर्ण । भजे = भजता हूँ।
अर्थ—जो चाँद की श्वेत चाँदनी के समान वस्त्र धारण किए हैं अर्थात् जिनके शरीर के वस्त्र बिजली की ज्योति के समान चमकते हैं, जिनके वक्षस्थल पर वनमाला फूल की माला लटक रही है, जिनका शरीर जल में खिले कमल जैसा सुन्दर है तथा जिनकी दोनों आँखें कमल के लाल वर्ण जैसे हैं, ऐसे सुन्दर रूप वाले श्रीकृष्ण को भजता हूँ।

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं
रत्मौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः।
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं
किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥8॥

शब्दार्थ-कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननंं = अधखिले कुन्त फूलों के समान चमकते दाँतों से युक्त मुखमंडल। रत्नमौलिं = मणि से। लसत = शोभित । कुण्डलं = कान के गहने, बाला, बाली। गण्डयोः = दोनों गालों पर। हारकेयूरकं = हार से युक्त । कङ्कणप्रोज्जवलं = चमकते हुए कंगनों से शोभित । किङ्किणीमञ्जुलं = पैजनियों से निकलती मधुर ध्वनि । श्यामलं = श्याम रंगवाले । तम् = उनको । भजे = भजता हूँ।
अर्थ-जिनके मुखमंडल अधखिले कुंद फूलों के सामन चमकते दाँतों से सुशोभित हो रहे हैं, दोनों गालों पर मणि के समान चमकते कुण्डल लटक रहे हैं। स्फटिक के चमकते हार गले में सुशोभित हो रहे हैं तथा पैरों की पैजनी से मधुर ध्वनि गुंजित हो रही है, ऐसे श्याम वर्ण वाले श्रीकृष्ण को भजता हूँ।

अभ्यासः

प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1 . विष्णोः पञ्च पर्यायवाचिनः लिखतः?
उत्तर - अच्युतः केशवः दामोदरः, श्रीधर : हरिश्च आदयः।
प्रश्न 2 . कविः के भजितुम् इच्छति ?
उत्तर - कविः श्रीकष्णं भजितुम् इच्छति।